Sanjana Kirodiwal
Pasandida Aurat Season 3

Pasandida Aurat Season 3 – 42

by Story With Sanjana September 10, 2026
written by Story With Sanjana September 10, 2026 2 comments
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Pasandida Aurat Season 3 – 42

Pasandida Aurat Season 3
Pasandida Aurat Season 3 by Sanjana Kirodiwal

मिस्टर देसाई ने अपने मैनेजर को आवाज दी और वह केबिन का दरवाजा खोलकर अंदर आया। जूतों के टक-टक की आवाज भरत और प्राची के कानो में पड़ी , दोनों ने एक साथ दरवाजे से अंदर आते शख्स को देखा। प्राची ने देसाई के नए मैनेजर को देखा तो उसका मुँह खुला का खुला रह गया और वह अपनी कुर्सी से उठ खड़ी हुई। भरत ने नए मैनेजर को देखा तो उसके पैरो तले जमीन खिसक गयी और दिल जोरो से धड़क उठा। उसे अपनी आँखों पर भरोसा नहीं हुआ।

मैनेजर मिस्टर देसाई के सामने आ खड़ा हुआ।
“वेलकम इन देसाई ग्रुप एंड कम्पनी , मिस्टर पृथ्वी उपाध्याय”,मिस्टर देसाई ने अपने सामने खड़े पृथ्वी से कहा
“माय प्लेजर सर”,पृथ्वी ने धीरे से मुस्कुराकर कहा
पृथ्वी को नए मैनेजर के रूप में देखकर जहा भरत के होश उड़े हुए थे वही पृथ्वी को देसाई ग्रुप में देखकर प्राची ख़ुशी से फूली नहीं समा रही थी। उस से दूर भागने वाला पृथ्वी आज उसके सामने था। प्राची ने अपनी ख़ुशी को अपने चेहरे पर नहीं आने दी वह बस ख़ामोशी से पृथ्वी को देखती रही।

“भरत , प्राची मीट पृथ्वी ! आज से ये मेरे नए मैनेजर है। आप दोनों ही इसे बहुत अच्छे से जानते है सो मुझे नहीं लगता मुझे इनका परिचय देने की जरूरत है। पृथ्वी तुम खड़े क्यों हो ? हेव अ सीट प्लीज”,मिस्टर देसाई ने कहा
“थैंक्यू सर”,पृथ्वी ने कुर्सी खिसकाकर उस पर बैठते हुए कहा

पृथ्वी का आना भरत को अच्छा नहीं लगा तो उसने मिस्टर देसाई से कहा,”सर आपने इनके बारे में पहले बताया नहीं ?”
“बता देते तो तुम मुझे यहाँ आने थोड़े देते”,पृथ्वी धीरे से बड़बड़ाया
“तुमने कुछ कहा पृथ्वी ?”,मिस्टर देसाई ने पृथ्वी को बड़बड़ाते देखकर पूछा
“अह्ह्ह्ह ! नाइस केबिन सर”,पृथ्वी ने कहा

“थैंक्यू पृथ्वी ! ये पूरा केबिन प्राची ने डिजाइन किया है”,मिस्टर देसाई ने कहा और फिर भरत की तरफ देखकर बोले,”भरत ! मैंने पहले ही तुम पर इस ऑफिस की इतनी सारी जिम्मेदारियां डाल रखी है इसलिए सोचा मैं खुद ही अपने लिए एक नया मैनेजर हायर कर लेता हूँ। पृथ्वी को ये ऑफर तो मैंने बहुत पहले ही दिया था लेकिन इसने अब जाकर एक्सेप्ट किया। पृथ्वी के आने से तुम्हारी आधी जिम्मेदारियां कम हो जाएगी”

भरत इस पर क्या कहता ? वह तो उलटा अपनी किस्मत को कोस रहा था साथ ही पृथ्वी को भी कि वह आज क्यों आया ? एक दिन बाद यहाँ आता तो शायद चीजे बदल चुकी होती। भरत ने ना चाहते हुए भी हामी में अपनी गर्दन हिलायी और जबरदस्ती मुस्कुरा दिया।
“सर ! आपने मुझे क्यों बुलाया था ?”,पृथ्वी ने कहा

“ओह्ह्ह हाँ ! मिस्टर शर्मा हमारी कम्पनी के साथ एक नयी डील करना चाहते है जिसका बजट लाखो में नहीं बल्कि करोडो में है ! भरत ने स्टडी करके पेपर्स तैयार किये है , मैं चाहता हूँ एक बार तुम उन पेपर्स को देख लो देन मैं उन पर सिग्नेचर करके उन्हें फाइनल कर देता हूँ”,मिस्टर देसाई ने कहा
पेपर देखने की बात सुनकर भरत के ललाट पर पसीने की बुँदे उभर आयी क्योकि इन्ही पेपर्स के साथ भरत ने एक लीगल पेपर भी रखा था जिस पर आज उसे मिस्टर देसाई के सिग्नेचर चाहिए थे।

भरत के ललाट पर पसीने की बुँदे देखकर पृथ्वी ने सामने रखे टिश्यू पेपर को उठाया और भरत की तरफ बढाकर कहा,”मिस्टर भरत लगता है आज गर्मी कुछ ज्यादा है”
“हहहहह,,,,,,,,,,,!!!!”,भरत ने चौंककर कहा
“पसीना पोछ लीजिये”,पृथ्वी ने सहजता से कहा
“AC तो फुल है , भरत तुम्हारी तबियत तो ठीक है ना ?”,मिस्टर देसाई ने कहा

“मैं ठीक हूँ सर”,कहते हुए भरत ने पृथ्वी के हाथ से टिश्यू लिया और अपना पसीना पोछ लिया।
“फाइल प्लीज”,पृथ्वी ने भरत से कहा तो भरत ने कहा,”अह्ह्ह फाइल अभी इन्कम्प्लीट है मैं इसे कम्प्लीट करके तुम्हे दे तुम्हे दे दूंगा”
“भरत ! तुमने तो कहा था फाइल कम्प्लीट है”,मिस्टर देसाई ने कहा
“सर वो मैं फायनेंस डिपार्टमेंट के पेपर्स अटैच करना भूल गया था , मैं इसे कम्प्लीट करके आपको देता हूँ”,भरत ने हड़बड़ाते हुए कहा

पृथ्वी ने भरत के हाथ से फाइल ली और कहा,”उसकी जरूरत नहीं है। फायनेंस पेपर डील साईन होने के बाद भी अटैच किये जा सकते है इट्स नॉट अ बिग डील,,,,,,,,!!!!”
भरत को काटो तो खून नहीं , फाइल पृथ्वी के हाथो में थी और उस फाइल में था कम्पनी का लीगल डॉक्युमेंट , अगर वह गलती से भी पृथ्वी के हाथ लगा और मिस्टर देसाई के सामने आ गया तो भरत का सारा खेल खत्म हो जाएगा।

पृथ्वी का आत्मविश्वास देखकर मिस्टर देसाई ने मुस्कुराते हुए भरत से कहा,”सी भरत ! देट्स व्हाई आई लाईक दिस मेन , इसके काम करने का तरिका सबसे अलग है,,,,,,,,,डोंट वरी पृथ्वी इसे देख लेगा,,,,,,,,,,तुम खड़े क्यों हो ? बैठो ना”
भरत ने धड़कते दिल के साथ कुर्सी खिसकाई और उस पर आ बैठा। पृथ्वी ने फाइल खोली और उसे पढ़ते हुए धीरे धीरे एक एक पन्ना पलटने लगा।

मिस्टर देसाई को प्राची के इरादों पर शक ना हो जाए इसलिए उसने उठते हुए कहा,”डेड ! मेरे फ्रेंड्स मेरा वेट कर रहे होंगे मैं चलती हूँ”
“ठीक है , आज शाम का डिनर घर पर तुम मेरे साथ कर रही हो प्राची , रिमेम्बर ?”,मिस्टर देसाई ने कहा
“यस डेड ! आई नो , मैं वक्त से आ जाउंगी”,मिस्टर देसाई से कहकर प्राची पृथ्वी की तरफ पलटी और अपना हाथ उसकी तरफ बढाकर कहा,”वेलकम इन देसाई ग्रुप मिस्टर उपाध्याय”

पृथ्वी ने प्राची की तरफ देखा तक नहीं और फाइल का पन्ना पलटते हुए कहा,”थैंक्यू मेम”
“हाउ रूड”,प्राची ने धीरे से कहा जो कि पृथ्वी के कानो से जा टकराया , उसने एक नजर प्राची को देखा और कहा,”माय प्लेजर”
प्राची ने मिस्टर देसाई को बाय कहा और वहा से चली गयी। उसे अपने शेयर्स चले जाने का जो दुःख था वह ख़ुशी में बदल चुका था क्योकि पृथ्वी इस कम्पनी में जो आ चुका था।  

 प्राची चली गयी और पृथ्वी एक बार फिर फाइल के पन्ने पलटने लगा और एकाएक उसकी नजर लीगल पेपर पर पड़ी जिसे देखकर भरत के प्राण सूख गए। पृथ्वी के ललाट शिकन और चेहरे पर परेशानी के भाव देखकर सामने बैठे मिस्टर देसाई ने कहा,”क्या बात है पृथ्वी , एवरीथिंग इज फाइन ?”
पृथ्वी की नजरे अभी भी लीगल पेपर पर थी और वह बड़े ध्यान से उस पर लिखे नोट्स पढ़ रहा था। उसने मिस्टर देसाई की तरफ देखा और कहा,”यस सर ! ऑल गुड,,,,,,,,,,!!!”

भरत ने जैसे ही सुना राहत की साँस ली , लीगल पेपर देखकर भी पृथ्वी ने मिस्टर देसाई को उसके बारे में नहीं बताया लेकिन अगले ही पल पृथ्वी ने उस लीगल पेपर को फाइल से निकाला और फाइल भरत की तरफ बढाकर कहा,”इसे मैं रख लेता हूँ , आप फायनेंस डिपार्टमेंट से मिलकर इस फाइल के पेपर कम्प्लीट करवा दीजिये”
मिस्टर देसाई को पृथ्वी पर यकीन था इसलिए उन्होंने कुछ नहीं कहा और अपने काम में लगे रहे। भरत ने पृथ्वी को घूरते हुए फाइल ली और उठकर वहा से चला गया। पृथ्वी ने भरत को जाते हुए देखा और मन ही मन मुस्कुरा उठा।

 सिद्धार्थ का घर , सिरोही
सिद्धार्थ पहले सुरभि के लिए परेशान था और अब वह सुरभि के घर आने से परेशान था। जगदीश जी सुरभि से मिलना चाहते थे और सुरभि आज उनके सामने बैठी थी लेकिन किचन में खड़े सिद्धार्थ को डर था कि सुरभि कही उनके सामने उलटी सीधी बात ना कह दे जिस से जगदीश जी और चिढ जाये और हमेशा हमेशा के लिए सुरभि को रिजेक्ट कर दे , ऊपर से सुरभि ने आलू के पराठे बनाने की बात कर सिद्धार्थ को और परेशान कर दिया।

किचन में खड़े सिद्धार्थ ने कूकर में आलू चढ़ाये और आटा गूंथने लगा। आटा गूंथकर साइड रखा और सबके लिए चाय चढ़ा दी। चाय कपो में छानकर सिद्धार्थ बाहर आया लेकिन बाहर का नजारा देखकर वह हैरान हुए बिना ना रह सका। उसे डर था कि सुरभि जगदीश जी के सामने कुछ गड़बड़ ना कर दे लेकिन वह तो उनके साथ बैठकर चेस खेल रही थी।

सिद्धार्थ चाय लेकर आया और ट्रे टेबल पर रखा , सुरभि का पूरा ध्यान चेस खेलने में था , उसने सिद्धार्थ की तरफ देखा तक नहीं। सिद्धार्थ ने जगदीश जी और गिरिजा जी को चाय दी और जैसे ही जाने लगा सुरभि ने चेस खेलते हुए चुटकी बजाकर कहा,”बिस्किट नहीं है क्या ?”
“हैं”,सिद्धार्थ ने दाँत पीसकर कहा

“है तो लेकर आओ,,,,,,इतना भी कॉमन सेन्स नहीं है आपके लड़के में अंकल”,सुरभि ने सिद्धार्थ को आर्डर दिया और फिर जगदीश जी की तरफ देखकर कहा
सिद्धार्थ का दिल तो किया हाथ में पकड़ी ट्रे उठाकर सुरभि के सर पर मार दे लेकिन बेचारा उस से प्यार जो करता था , नहीं मार पाया और वहा से चला गया। गिरिजा जी ये सब देख सुनकर मंद मंद मुस्कुरा रही थी। उन्हें तो सुरभि बहुत पसंद थी और अब धीरे धीरे वह जगदीश जी के साथ भी घुल मिल रही थी।

किचन में आकर सिद्धार्थ ने ट्रे को प्लेटफॉर्म पर पटका और खुद में ही बड़बड़ाया,”हाह ! मैं यहाँ इसे लेकर परेशान हो रहा था और ये यहाँ पापा के साथ बैठकर चेस खेल रही है , ऊपर से मुझे आर्डर दे रही है,,,,,,,,,,,,,,,क्या अजीब लड़की है , ऐसी सिचुएशन में भी ये इतना चिल कैसे कर सकती है ?”

सिद्धार्थ ने रेंक में रखा डिब्बा उठाया और उसने रखे बिस्किट निकालकर प्लेट में रखे और बाहर चला आया। उसने बिस्किट की प्लेट को लगभग सुरभि के सामने टेबल पर पटका और चिढ़े हुए स्वर में कहा,”बिस्किट,,,,,,,,,,,!!!!”
सुरभि ने जगदीश जी की तरफ देखा और कहा,”अंकल ! मैं आपको बाद में हराऊंगी पहले चाय पीते है”

सुरभि ने चाय का कप उठाया और साथ ही दूसरे हाथ से प्लेट में रखा बिस्किट उठाकर चाय में डुबोया और खाने लगी। सिद्धार्थ भी अपनी चाय लेकर एक तरफ बैठा था। जगदीश जी खाली चाय पी रहे थे ये देखकर सुरभि ने एक बिस्किट उठाकर उनकी तरफ बढ़ाया और कहा,”अरे अंकल मेरी तरह चाय में डुबोकर खाइये ना , अच्छा लगेगा”

“ये लड़की अपने साथ साथ मुझे भी इस घर से निकलवाकर मानेगी”,सिद्धार्थ मन ही मन बड़बड़ाया क्योकि उसने अपने पापा को हमेशा सीरियस ही देखा था। वे घर में बहुत कम बात करते थे और आज तक उसने अपने पापा को बिस्किट खाते तो कभी नहीं देखा था।
सिद्धार्थ इंतजार कर ही रहा था कि अब जगदीश जी ने सुरभि को डाँटा अब डाँटा लेकिन अचानक हुआ एक चमत्कार , जगदीश जी ने सुरभि का दिया बिस्किट लिया और उसे चाय में डुबोकर खाने लगे।

जगदीश जी सुरभि की तरफ देखा और कहा,”हम्म्म ! बढ़िया है”
सुरभि ने जगदीश जी को हाई फाइव देने के लिए अपना हाथ बढ़ाया ये देखकर तो सिद्धार्थ ने अपनी आँखे ही मीच ली क्योकि सुरभि इस घर में वो काम कर रही थी जो आज से पहले कभी नहीं हुए लेकिन यहाँ भी सिद्धार्थ हैरान हुआ जब जगदीश जी ने हँसते हुए सुरभि को हाई फाइव दे दिया और अपनी चाय पीने लगे।

सिद्धार्थ को तो अपनी आँखों पर यकीन ही नहीं हुआ कि ये वही जगदीश जी थे जो हर वक्त गुस्से में रहते थे। चाय खत्म होने के बाद सुरभि ने अपना कप साइड में रखा और देखा सिद्धार्थ कप हाथ में थामे कही खोया हुआ है तो उसने कहा,”ओह्ह्ह हेलो ! मेरा पेट सिर्फ चाय बिस्किट से नहीं भरने वाला , पराठे बनने में कितना टाइम लगेगा ?”

सुरभि की आवाज से सिद्धार्थ की तंद्रा टूटी , वह उठा और किचन की तरफ चला गया ! सिद्धार्थ को अकेले परेशान होते देखकर गिरिजा जी बार बार किचन की तरफ देख रही थी ये देखकर सुरभि ने कहा,”रिलेक्स आंटी ! वो बना लेगा आप खामखा परेशान हो रही है,,,,,,,,,!!!”
गिरिजा जी ने सुना तो मुस्कुरा दी और फिर जगदीश जी और सुरभि को चेस खेलते हुए देखने लगी।

किचन में आकर सिद्धार्थ ने आकर आलू का मसाला बनाया और पराठे बनाने लगा , बेचारा सिद्धार्थ जिसने आज तक कभी गोल रोटी नहीं बनायीं थी आज पराठे बना रहा था। गोल तो नहीं लेकिन आड़े टेड़े पराठे बनाने में सफल हो गया। उसने जगदीश जी , गिरिजा जी और सुरभि के लिए प्लेट में एक एक पराठा , थोड़ा अचार और दही रखा और लाकर उन्हें दिया। जगदीश जी और गिरिजा जी धीरे धीरे खा रहे थे लेकिन सुरभि इतनी बड़ी भुक्कड़ कि सिद्धार्थ जैसे ही किचन में पहुंचा सुरभि चिल्लाई,”एक और”

सिद्धार्थ ने जल्दी जल्दी एक और पराठा सेंका और सुरभि की प्लेट में रख दिया। सुरभि ने उसे भी चट कर दिया और जैसे ही सिद्धार्थ ने तवे पर पराठा डाला सुरभि ने आवाज लगाईं,”मुझे और चाहिए”
सिद्धार्थ को गुस्सा तो बहुत आया कि सुरभि उसकी मदद करने के बजाय बाहर बैठकर उसे परेशान कर रही है लेकिन उसे अपने गुस्से को पीना पड़ा और जल्दी जल्दी एक और पराठा सेंककर सुरभि की प्लेट में रखते हुए उसे घुरा तो सुरभि मुँह में ठुसे पराठे के साथ मुस्कुराई और अपनी खाने की स्पीड धीरे कर दी।

सिद्धार्थ ने दो पराठे और सेंके और जगदीश जी गिरिजा जी की प्लेट में परोस दिए।
अब तक वह किचन से हॉल , हॉल से किचन के चक्कर काटते थक चुका था  

हॉल में बैठी सुरभि ने अपना तीसरा पराठा खत्म किया और जैसे ही सिद्धार्थ को आवाज लगाने को हुई गिरिजा जी ने कहा,”बेटा ! तुम अंदर जाकर खुद ही ले लो”
सुरभि अपनी प्लेट लेकर किचन में चली आयी तो देखा सिद्धार्थ थककर प्लेटफॉर्म से पीठ लगाकर खड़ा है
“और मिलेगा क्या ?”,सुरभि ने धीरे से कहा
सुरभि की आवाज सुनकर सिद्धार्थ ने उसकी तरफ देखा और चिढ़कर उसकी तरफ आते हुए कहा,”एक काम करो मुझे खा लो”

सुरभि ने सुना तो मुँह बनाया और प्लेट साइड में रखकर कहा,”नहीं है तो मना कर दो , इतना भाव क्यों खा रहे हो ?”
सिद्धार्थ पीछे हटा और हैरानी से सुरभि को देखने लगा। सुरभि को इस बात की ज़रा भी परवाह नहीं थी कि पिछले दो दिन सिद्धार्थ कितना परेशान हुआ था , उल्टा वह सिद्धार्थ से और पराठे देने की बात कर रही थी।
सिद्धार्थ को अपनी तरफ देखते पाकर सुरभि ने अपनी ऊँगली चाटते हुए कहा,”क्या ?”

“सुरभि सीरियसली तुम यहाँ पराठे खाने आयी हो ?”,सिद्धार्थ ने हैरानी भरे स्वर में पूछा
“सुबह घर से भागी तब से कुछ भी नहीं खाया था तो भूख लगी थी मुझे,,,,,,,,,,,,!!!”,सुरभि ने कुनमुनाते हुए कहा
सिद्धार्थ ने सुना तो हैरानी से सुरभि की तरफ देखा और कहा,”क्या ? तुम घर से भागकर आयी हो ?”
सुरभि ने सुना तो सिद्धार्थ की तरफ देखा , मुस्कुराई और बड़े ही प्यार से कहा,”नहीं ! मेरे पिताजी बेंड बाजे के साथ मुझे तुम्हारे घर के बाहर छोड़कर गए थे,,,,,,,,,,,,!!

सिद्धार्थ समझ पाता इस से पहले सुरभि ने गुस्से से मारवाड़ी में कहा,”तू थोड़ो सो गेल्सप्पी झालर है के ?”

( तो अगर आप राजस्थानी है तो आप जानते होंगे कि हमारे यहाँ “गेल्सप्पी झालर” किसे कहते है ? और अगर नहीं जानते तो कमेंट कीजिये अगले भाग में मैं बता दूंगी )

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संजना किरोड़ीवाल

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Pasandida Aurat Season 3 by Sanjana Kirodiwal
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2 comments

Kshmata chauhan September 10, 2026 - 12:27 pm

Main to imagine kar rhi hon ki Siddarth aalu k parathe bana rha hai aur surbhi gapa-gapa kar kaa rhi hai…🤣🤣🤣 Bechara Siddarth kaha Surbhi k liye preshan tha aur ab Surbhi ne usko rail bana rakhi hai 👌😁👌 jiyo Surbhi jiyo…bas ab Siddarth k papa maan jaye tum dono k rishte k liye…fir tum dono (Siddarth-Surbhi) uss Aniket ko sabak sikhana..lakin yeh Prithvi ne Mr. Desai k yaha kyu join Kiya…samaj nhi aa rha aur dusri baat yeh ki jab usne Bhart ka letter dekh liya to usko jail kyu nhi bijwaya… Bhart ki pol kyu nhi kholi…bahot suspension hai yr

Reply
Pooja panjwani September 10, 2026 - 2:50 pm

Thoda SA pagal

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अकेली लड़की in जयपुर" को एक कहानी ना कहकर "मेरा अनुभव" कहा जाए तो बेहतर होगा। एक ऐसी लड़की की कहानी जो अपने हुनर और जरूरतों के बीच पिसती नजर आती है। जो अपने सपनो को पूरा करने के लिए हर बार एक नयी कोशिश करती है बस हार नहीं मानती , अकेलेपन से एकांत का ये सफर आपको सोचने पर मजबूर कर देगा और अंत में आप खुद को अपने सपनो के करीब पाएंगे,,,,,,,,!!

अकेली लड़की in जयपुर" को एक कहानी ना कहकर "मेरा अनुभव" कहा जाए तो बेहतर होगा। एक ऐसी लड़की की कहानी जो अपने हुनर और जरूरतों के बीच पिसती नजर आती है। जो अपने सपनो को पूरा करने के लिए हर बार एक नयी कोशिश करती है बस हार नहीं मानती , अकेलेपन से एकांत का ये सफर आपको सोचने पर मजबूर कर देगा और अंत में आप खुद को अपने सपनो के करीब पाएंगे,,,,,,,,!!

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